मानव, मानवता व मानवाधिकार
July 19, 2019 • DR M U DUA
मानवाधिकार अत्यंत ही विस्तृत विषय है। इस पर जितनी खोज हुई है, काफी कम साबित हुई है। मानव एक विवेकशील प्राणी है, मानव भावनाओं से भरा प्राणी है। कई मानवीय कार्य भावनाओं के वशीभूत होकर किए जाते हैं। भावनाएं अच्छी भी होती हैं, और बुरी भी होती हैं। मनुष्य अपने विवेक के अनुसार कार्य करता है। कभी-कभी व्यक्ति स्वार्थवश कुछ ऐसे कार्य कर जाता है जो गलत माने जाते हैं। वह गलत भावनाओं में बहकर गलत फैसला ले लेता है। मानवीय संवेदनाएं व्यक्ति के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। मनुष्य से जुड़ी लगभग सभी चीजें मानवाधिकारों के दायरे में आती हैं। जब मानव हितों को चोट पहुंचती है या अधिकारों से उसे वंचित किया जाता है तो यह मानवाधिकारों का उल्लंघन माना जाता है। यह कई रूपों में देखने को मिलता है। प्रेम, दर्द, हंसी, अपराध, आंसू, मौत, जिन्दगी, बाल्यावस्था, युवास्था, बुढ़ापा, आशा-निराशा, न्याय-अन्याय, कर्त्तव्य, आह जैसी चीजें भी मानव की अवस्था व भावनाओं से जुड़ी हैं। एक मानव के अंदर उपरोक्त तमाम चीजें रची बसी हैं। 
एक बच्चा जब जन्म लेता है तो उस समय वह सिर्फ एक मानव होता है। वह जब रोता है तो उसकी क्या भाषा होती है उसका अनुमान माता-पिता या परिजन अपनी भाषा के अनुसार लगाते हैं क्योंकि किसी भी वर्ण, समुदाय, जाति में जब कोई बच्चा पैदा होता है तो सबकी हरकतें एक जैसी ही होती हैं। सभी बच्चे नाल से मां से जुड़े रहते हैं। मां के पेट में उल्टे लटके रहते हैं। बाहर निकलने के बाद नाल काटकर उन्हें अलग किया जाता है। बाहर आने के बाद बच्चा रोता है, हंसता है, खेलता है, हाथ-पैर मारता है। मां की गोद से चिपक जाता है, दूध पीता है, सोता है, फिर जागता है। ये सभी समुदाय-सभी वर्ग के बच्चों में देखने को मिलता है। हम पृथ्वी पर आने के बाद अपने आप को बांट लेते हैं। कोई हिन्दू हो जाता है, तो कोई मुसलमान, कोई पारसी, कोई यहूदी। इसी तरह से धर्म के बाद लोग जातियों में बंट जाते हैं। कोई ऊंची जाति, कोई नीची जाति, कोई गोरा, तो कोई काला कहलाने लगता है। यहीं से मानवाधिकारों के प्रति उल्लंघन की शुरूआत होती है। 
मानव इस पृथ्वी पर जीने के लिए, कुछ पाने के लिए निरंतर संघर्ष करता है। इस संघर्ष की दुनिया में वह छोटी और बड़ी लड़ाइयां लड़ता है। इन लड़ाइयों को लड़ने में लोग लगातार बंटते जाते हैं। कभी हम एक घर के आदमी होते हैं, फिर हम एक गली के माने जाने लगते हैं, उसके बाद किसी ग्राम या मोहल्ले के हो जाते हैं। इसके पश्चात हम ब्लॉक, तहसील, जिला, प्रांत व देश के स्तर पर बंट जाते हैं। यह प्रक्रिया निरंतर जारी है। मानव इसी में लगा हुआ है। मानव कभी सीमाओं को लेकर लड़ता है, कभी अपने रंग की खातिर लड़ता है, कभी अपनी जाति की खातिर लड़ता है, कभी अपने संप्रदाय की खातिर लड़ता है, कभी अपने परिवार की खातिर लड़ता है। अंत में परिवार में आकर वह अपने लिए अपनों से ही लड़ने लगता है। यही इस दुनिया में जीवन की रीति मान ली गई है। आज हम देश, समुदाय, प्रांत, जिला, जाति में बंट कर रहते हैं। अगर देशों की सीमाएं न होती, जातियों का बंधन न होता, सम्प्रदायों का घेरा न होता, गोरे-काले का भेद न होता, मानव सिर्फ मानव होता तो आज इस दुनिया का रंग कैसा होता है ? क्या कभी हमने सोचा है कि जो पक्षी साइबेरिया से उड़कर भारत में चले आते हैं, भारत के जो पक्षी पाकिस्तान में पहुंच जाते हैं, भारत की नदियां पाकिस्तान, बांग्लादेश पहुंच जाती हैं, हिंद महासागर, प्रशांत महासागर, ये देश की सीमाओं को नहीं मानते। इसी तरह चांद, सूरज और तारे भी जाति-पाति, द्वेष, भेदभाव और सीमाओं को नहीं मानते। सूरज कहां उगता है, कहां अस्त होता है, हवा कहां तेज चलती है, कहां धीमी हो जाती है उसे इस बात का एहसास नहीं होता। तो मानव ही क्यों सीमाओं के दायरे में रहता है ? मनुष्य को अमेरिका, जापान, रूस, पाकिस्तान, आस्ट्रेलिया, फ्रांस, इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका या अन्य देशों में जाने के लिए पासपोर्ट व वीजा की आवश्यकता पड़ती है। मानव अपने आप को इस पृथ्वी का सबसे समझदार व विवेकशील प्राणी मानता है। इतना विवेकशील होने के बावजूद भी मानव खंडों में बंटता क्यों जा रहा है ? आज मानव ने पारमाणविक और जैविक हथियारों का इतना बड़ा जख़ीरा खड़ा कर लिया है कि करीब डेढ़ दर्जन बार इस पृथ्वी को नष्ट किया जा सकता है। क्या यह मानव की उपलब्धि है? क्या यही विज्ञान की उपलब्धि है ? यदि विज्ञान हमें एक-दूसरे को मारने की सीख देता है, घृणा फैलाता है, तो हम इस विज्ञान को अपना मित्र माने या शत्रु ? इस पर मानव को गहनतापूर्वक विचार करने की जरूरत है।
एक व्यक्ति अपराधी क्यों बन जाता है ? उसे जिन्दगी की अपेक्षा मौत की चाह क्यों हो जाती है ? वह निराशावाद के गहन दलदल में चला जाता है। खुशियों की फुलवारी से हटकर वह आहों और तन्हाईयों में खो जाता है। जिन्दगी आंसुओं से भर जाती है, जोकि उसके लिए बोझ बन जाती है। यह सब परिस्थितियां मानव के जीवन में क्यों उत्पन्न होती हैं ? इस पर भी गहन रूप से विचार एवं मंत्रणा करने की जरूरत है। यह विषय आत्मचिंतन और आत्ममंथन दोनों का है। आज हमारे समाज का दृष्टिकोण एकांगी होता जा रहा है। महानगरों से लेकर छोटे नगरों में भी अब ओल्डऐज होम खुलने लगे हैं। 
ओल्डऐज होम की बढ़ती संख्या को देखकर भारत की बढ़ती आबादी या भारत में बढ़ती बुजुर्गों की संख्या का अनुमान नहीं लगाया जा सकता बल्कि इनसे मानव की बदलती स्वार्थी प्रवृत्ति का पता लगता है। मनुष्य के अंदर एकांगी दृष्टिकोण का आना, स्वार्थपरता, बुजुर्गों के प्रति सम्मान की भावना कम होना जैसी प्रवृत्तियां घर करती जा रही हैं। ऐसा तो जानवर भी नहीं करते। जानवर भी एक साथ रहते हैं। जंगलों में रहने वाले पशु या जानवर झुंड में शिकार के लिए या अपने भोजन के लिए निकलते हैं और अपनी क्षुधा शांत करने के बाद साथ-साथ रहने लगते हैं। भले ही जानवर एक-दूसरे से लड़ते हैं परन्तु रहते साथ ही हैं। मानव तो एक-दूसरे से तन से भी लड़ता है और मन से हमेशा लड़ता रहता है। किसी व्यक्ति की यदि किसी व्यक्ति से लड़ाई हो गई या दुश्मनी हो गई तो दोनों एक-दूसरे को नीचा दिखाने का प्रयास करते हैं। सामने और पीठ पीछे दोनों तरह से लोग एक-दूसरे के खिलाफ क्रियाशील रहते हैं। विडंबना तो यह है कि तन से तो वे एक-दूसरे के विरोध में लगे ही रहते हैं, उनका मन भी इसी में लगा रहता है। लड़ने के बाद वे कोर्ट-कचहरी या पंचायतों के चक्कर में पड़ते हैं इससे उनका धन भी नष्ट होता है। ऐसे में ये कहा जा सकता है कि तन-मन-धन तीनों से एक-दूसरे के पीछे पड़ जाते हैं। वहीं बेजुबान पशु-पक्षी या जानवर ऐसा नहीं करते। वे लड़ते जरूर हैं पर बाद में शांत होकर एक साथ रहने लगते हैं और मन में कोई बात नहीं रखते। यही वजह है कि कोई व्यक्ति जब जानवरों को मारना चाहता है तो वे मिलकर आक्रमण कर देते हैं। मनुष्य हर जगह लड़ने को विवश क्यों हैं ? वह शांत क्यों नहीं रह सकता ? मानव-मानव में सच्चा प्रेम क्यों नहीं है? अगर ये सब चीजें ठीक हो जाएं तो दुनिया ही बदल जाएगी। क्या ऐसा नहीं है कि मानव अपने मूल मुद्दे से भटक गया है? मानव ने अंटार्टिका महाद्वीप में रहना शुरू कर दिया है। मानव ने चांद और मंगल ग्रह पर भी अपना पैर रख दिया है। मानव ने पृथ्वी पर मौजूद तमाम संसाधनों का सदुपयोग करते-करते दुरुपयोग करना शुरू कर दिया है। 
प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करते-करते मानव प्रकृति को नष्ट करने में लग गया है। पहले मानव पृथ्वी से अन्न व फल पैदा करके जीवनयापन करता था। आज अपनी विलासिता के लिए मनुष्य ने पृथ्वी को ही खोखला कर दिया है। अपनी अहमियत को जताने के लिए मनुष्य ने पृथ्वी के नीचे परमाणु परीक्षणों का ढेर लगा दिया है। ऐसा करके मानव ने अपने लिए विनाश का रास्ता तैयार कर लिया है। पृथ्वी प्रदूषित हो चुकी है।
 पृथ्वी से पेड़ों का कटना निरंतर जारी है। जंगल खत्म होते जा रहे हैं। इसी का परिणाम है कि विभिन्न शहरों में तेंदुआ, चीता, शेर जैसे जानवर घरों में घुसने लगे हैं। दातों के लिए हाथियों को मार दिया जाता है तथा खालों के लिए भी जानवरों को मारा जा रहा है। वन्य जीवों की अंधाधुंध हत्या भी प्रकृति के साथ घोर अन्याय है। पहले गांव में कौआ, तीतर, बटेर, कोयला, गौरेया, मोर जैसे पक्षियों की भरमार हुआ करती थी। आज इन पक्षियों में तमाम की प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं। कोयल देखने को नहीं मिलती। शहरों में कबूतरों की संख्या बढ़ रही है। गांव में पेड़-पौधे काफी कम रह गए हैं। गौरेया जैसी छोटी सी पक्षी ने भी पलायन करना शुरू कर दिया है। इसी तरह से जंगलों में से तमाम वन्य प्राणी भी विलुप्त हो चुके हैं। हिरन, बारहसिंगा, शेर, चीता के साथ-साथ, दरियाई घोड़ा जैसी प्रजातियाँ विलुप्त होने की कगार पर आ गई हैं। नदियां-तालाब सूख गए हैं। ऐसे में मछलियों की प्रजातियां भी विलुप्त हो रही हैं। और तो और गंगा, यमुना, सरयू, ब्रह्मपुत्र, क्षिप्रा, गोदावरी, कृष्णा जैसी पवित्र नदियों का जल भी अशुद्ध हो चुका है। काशी व प्रयाग हिन्दुओं के लिए सबसे पुण्य नगरी मानी जाती है। इन नगरों में गंगा का पानी विषैला हो चुका है। किनारे से लेकर करीब 5 से 10 मीटर के बीच पानी अत्यंत ही विषैला हो चुका है। इसी तरह से मथुरा में यमुना नदी का पानी कोकाकोला के रंग का हो गया। मानव द्वारा पैदा किए प्रदूषण से जन्तुओं का भी नाश हो रहा है। मछलियां नष्ट हो रही हैं। 
इसी तरह से हम आधुनिक और वैज्ञानिक खेती के नाम पर उर्वरकों का अंधाधुंध प्रयोग करते जा रहे हैं। इससे उर्वरा शक्ति कम होती जा रही है। आज के 50-60 साल पहले, ऊसर और बंजर भूमि को उर्वरा बनाने के लिए कारगर प्रयास किए गए। आज हमारी उपजाऊ भूमि भी उर्वराशक्ति खोती जा रही है। अधिक मात्रा में उर्वरकों के प्रयोग से मिट्टी के अंदर के कई महत्वपूर्ण तत्व समाप्त हो रहे हैं। पृथ्वी के अंदर केंचुआ जैसे जीव हुआ करते थे जो पृथ्वी की उर्वरा शक्ति को बढ़ाते थे वे भी नष्ट होने लगे हैं। सिंचाई के संसाधनों को बढ़ाने के लिए नहरों का जाल बिछ गया है तथा मोटर पम्पों से जमीन के नीचे का जल भारी मात्रा में निकाला जा रहा है। इससे पृथ्वी के अंदर का जलस्तर काफी नीचे चला गया है। इससे आगे आने वाले दिनों में देश के कई भागों में पैदावार में कमी आएगी फलस्वरूप आगे चलकर भारी खाद्यान्न संकट उत्पन्न हो सकता है। यह खाद्यान्न संकट महामारी का रूप ले सकता है। खाद्यान्न की कमी होने से आगे चलकर लोग किसी अन्य तरीकों से अपना भोजन का प्रबंध करने लगेंगे। ऐसे में मछलियों और अन्य समुद्री जीवों पर भी भारी संकट आ सकता है। उपरोक्त तमाम परिस्थितियों को यदि ध्यान में रखकर देखा जाए तो हम यह कहने को बाध्य हो जाते हैं कि मानव के लिए आज जो संकट खड़ा हुआ है वह मानव द्वारा ही निर्मित है। मानवाधिकारों के लिए आज मानव इसलिए जूझ रहा है क्योंकि एक मानव, दूसरे मानव के प्रति संवेदनशील नहीं रह गया। समाज में संवेदनशीलता खत्म होती जा रही है। लोग अपने ही दर्द और तड़प को दर्द और तड़प समझ रहे हैं। दूसरे के दर्द और तड़प को लोग देखना नहीं चाहते। ज्यादातर लोग समाज में दिखाने के लिए, इज़्ज़त पाने के लिए कुछ सामाजिक कार्य कर रहे हैं। मनुष्य के अंदर ढोंग की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। मनुष्य दोहरी जिन्दगी जीने लगा है। समाज के लिए और अपने लिए कुछ और। कहने के लिए मनुष्य समाज सेवा में लगा होता है पर उस समाज सेवा की आड़ में वह क्या-क्या करता है, यदि इस पर वह स्वयं विचार करें तो वह सच्चाई से परिचित हो पाएगा। वह इतना व्यस्त है कि उसके पास सोचने का वक्त ही नहीं है। आज तमाम जगहों पर मानवाधिकार की बात हो रही हैं, गोष्ठियां हो रही हैं। इन गोष्ठियों में होने वाली चर्चाओं में भाग लेने वाले ज्यादातर लोग किस नजरिए के होते हैं इस पर भी विचार किया जाना चाहिए। हमें कुछ ऐसे लोग दिख जाते हैं जो सही मायने में मानवतावादी न होने के बावजूद वे मानवाधिकार की बात करते हैं।  
मानव का जिस समाज में जन्म होता है उसी समाज के अनुरूप उसके अधिकार भी हो जाते हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ की सार्वभौम घोषणा में कहा भी गया है सभी मानव समान अस्तित्व और समान अधिकार के साथ स्वतंत्र रूप से जन्म लेते हैं, वे बुद्धि और अन्तःकरण से युक्त होते हैं। उन्हें भाईचारे की भावना के विकास की दिशा में प्रयत्न करने चाहिए। इस घोषणा पर विचार करने के बाद मन में कई बातें उठती हैं। मनुष्य मानवाधिकारों के लिए तभी काम करेगा जब वह सही मायने में मानव धर्म को मानने वाला हो। आज समाज में सबसे पहले लोगों को मानव बनने की जरूरत है। मानवाधिकारों के प्रति जागरूकता पैदा करने से पहले हमें लोगों को यह बताने की जरूरत है कि मानव का धर्म क्या है ? उसका कर्त्तव्य क्या है ? मानव का सच्चा कर्म क्या है ? जिसके बल पर वह मानव कहला सके। इसके लिए हमें प्राथमिक स्तर पर लोगों के अंदर चेतना जाग्रत करने की जरूरत है। जब मानव अपने स्वभाव को ही भूल जाएगा तो वह सच्चा मानव कैसे कहलाएगा ? जब तक कोई सच्चा मानव नहीं बन पाएगा तब तक वह मानवाधिकारों की बातें कैसे समझेगा ? समाज के मनीषियों, बुद्धिजीवियों, मानवाधिकार के रहनुमाओं, सरकार के प्रतिनिधियों, सयुंक्त राष्ट्र संघ के प्रतिनिधियों से मेरा आग्रह है कि वे इस बारे में गंभीरतापूर्वक विचार करें। 
आज मानवाधिकार आयोग से जुड़े लोगों को सबसे पहले समाज में मानवता की शिक्षा दी जानी चाहिए। मानवीय गुणों, मानवीय धर्मों, मानवीय परंपराओं, मानवीय पहलुओं पर लोगों को प्रशिक्षित किया जाना जरूरी है। इसके लिए समाज में चेतना जाग्रत करने की जरूरत है। इसके बाद ही मानवाधिकारों पर शिक्षा देने का फल मिल सकता है। 
आज हम देखते हैं कि नौंवी और दसवीं में पढ़ने वाला छात्र अश्लील हरकतें करता है, लड़कियों से छेड़छाड़ करता है, पॉकेटमारी, चाकूबाजी, पिस्तौल और बम चलाता है। यह चूक क्यों हुई, किससे हुई, कौन है जिम्मेदार ? इसके लिए उसका परिवार जिम्मेदार है, उसके माता-पिता जिम्मेदार हैं, उसके शिक्षक जिम्मेदार हैं या पूरा समाज जिम्मेदार है, या हमारी व्यवस्था जिम्मेदार है ? जब तक हम इसकी जिम्मेदारी महसूस नहीं करेंगे, तब तक इस समस्या का निदान नहीं ढूंढ सकते। किसी का बेटा आवारा हो गया है, या लड़की आवारा हो गई है। तो इसका दोष दूसरों पर मढ़ दिया जाता है। समाज, माता-पिता पर दोष मढ़ता है, माता-पिता उसके संगे-साथियों, रिश्तेदारों पर दोष मढ़ते हैं। इसकी जिम्मेदारी कोई नहीं लेता, कोई अपने आपको दोषी नहीं मानता। इसीलिए ऐसी घटनाएं बढ़ रही है। समस्या की जड़ क्या है ?
जन्म लेने के बाद हर इंसान सिर्फ इंसान होता है। यहां आकर समाज के अनुसार कोई हिन्दू बन जाता है, कोई मुस्लिम, कोई सिख, कोई ईसाई। यह भी कोई बुरी बात नहीं है। हम जिस समाज या जिस धर्म में रहते, पलते, बढ़ते और जीते हैं। हमें उस समाज के साथ-साथ प्रत्येक धर्म, प्रत्येक समुदाय, प्रत्येक क्षेत्र, प्रत्येक देश का सम्मान करना चाहिए। जहां हिंदू धर्म में मानव धर्म को श्रेष्ठ बताया गया है। विश्व बन्धुत्व की भावना ही हिन्दुत्व में रची-बसी है। इसी तरह से इस्लाम धर्म भी मानवता और विश्व बन्धुत्व से पूरी तरह से ओत-प्रोत है। इस्लाम कहता है कि मां-बाप के साथ अच्छा व्यवहार करो, नातेदारों के साथ अच्छा व्यवहार करो, यतीमों और मोहताजों के प्रति भी व्यवहार अच्छा होना चाहिए। इसके साथ ही पड़ोसियों,  आश्रितों के साथ अच्छा व्यवहार करने की शिक्षा दी जाती है। इस्लाम मनुष्य को शांति और सहिष्णुता का मार्ग दिखाता है। ये सत्य, अहिंसा, कुशलता का समर्थक है। इसके लक्ष्य शांति, सुधार और निर्माण है। इस्लाम धर्म कमजोरों के अधिकारों का रक्षक है। इसी तरह ईसाई धर्म में भी मानव और मानवता की महत्ता का वर्णन मिलता है। ईसाई धर्म में भी विश्व बन्धुत्व और मानव का मानव के प्रति प्रेम, सहिष्णुता, उदारता, सरलता जैसे गुण विद्यमान हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि दुनिया का कोई भी धर्म गलत राह पर चलने की शिक्षा नहीं देता।
सभी धर्म जोड़ने की बातें करते हैं। फिर भी कितनी बड़ी विडंबना है कि इस पृथ्वी पर लोग धर्म के नाम पर बंटे हुए हैं। सोचने वाली बात यह है कि हम भले ही विभिन्न धर्मों से, विभिन्न देशों से जुड़े हुए हैं, परन्तु हम सब एक हैं। हम सब उसी परमात्मा, अल्लाह, गॉड की देन हैं जिसने सबको बनाया है। ऐसे में हम आपस में क्यों लड़ते हैं, ये आज तक समझा नहीं जा सका है। हम जब सच्चे मानव बन जाएंगे तो मानवाधिकार की बातें आसानी से समझ में आ जायेंगी, क्योंकि मानव बनते ही हम मानवीय गुणों और मानवीय धर्मों, मानवीय पंरपराओं का पालन शुरू कर देंगे।
आज मानव ऊपर से कुछ और अंदर से कुछ और क्यों है ? इस पर हमारे वैज्ञानिकों और धर्म गुरुओं और समाज सुधारकों को विचार करना चाहिए। 
मानव की समस्या
ज्यादातर मानव वर्तमान में जीना नहीं चाहते। वे या तो भूतकाल से जुड़े रहते हैं, या भविष्य के सपनों में खोए रहते हैं। मानव जो कुछ भी है उससे संतुष्ट नहीं हैं। हम कुछ और होना चाहते हैं। कुछ खोने या कुछ पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। यहीं संघर्ष टकराव का कारण बनता है जिससे तमाम तरह के अवगुण उत्पन्न होते हैं। कभी-कभी मानव कुछ अलग बनने के लिए, विशेष बनने के लिए कुछ ऐसा कर जाता है जो अमानवीय कृत्य कहलाता है। किसी कार्यालय में कोई र्क्लक, हेड र्क्लक बनना चाहता है, छोटा अधिकारी बड़ा अधिकारी बनना चाहता है और बड़ा अधिकारी सी.ई.ओ या डायरेक्टर बनना चाहता है। कुरूप इंसान, सुंदर बनने का प्रयत्न करता है। सुंदर दिखने के लिए कभी कपड़ों से अपने आपको संवारता, कभी चेहरे को संवारता है, कभी बालों पर रंग-रोगन करता है, परन्तु अपने विचारों, भावनाओं को संवारने के लिए वह कम प्रयास करता है। इसलिए ऐसे मानव उलझकर रह जाते हैं और यह उलझाव की स्थिति आगे इतनी बिगड़ जाती है कि मानवीय गरिमा को ठेस पहुंचती है। मानव ने इतने घातक हथियारों का जख़ीरा खड़ा कर लिया है जिससे मानव तो नष्ट हो ही सकता है साथ ही पूरी सभ्यता भी नष्ट हो सकती है। ऐसी स्थिति में पृथ्वी पर रहने वाले जीव-जंतुओं का नष्ट होना भी तय है। मानव की सोच इतनी वीभत्स क्यों होती जा रही है? प्रथम विश्वयुद्ध और द्वितीय विश्वयुद्ध क्यों हुए? इसका आसान उत्तर यही होगा। मानव, मानव के ऊपर अपनी श्रेष्ठता साबित करने के लिए व्यग्र हो गया है। ऐसे में उसने इंसानियत की चूलें ही हिला दी हैं। प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध में इतने मनुष्यों की बलि चढ़ी जिससे पृथ्वी भी थर्रा उठी। इसके बावजूद युद्ध के प्रणेताओं की पिपासा शांत नहीं हुई। तत्पश्चात् दुनियाभर के लोगों ने जब विचार किया तो यह पाया कि कुछ तानाशाह राष्ट्राध्यक्ष व शासनाध्यक्ष अपनी झूठी शान के लिए पूरी पृथ्वी और मानवता को नष्ट करने पर  तुले हैं। 
द्वितीय महायुद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ का गठन हुआ जिससे हिंसा को रोकने में सहायता मिली। तत्पश्चात अस्तित्व में आए मानवाधिकार आयोग ने पूरे विश्व में मानवाधिकारों की ललक जगाने का प्रयास किया। उसी का परिणाम है कि आज काफी हद तक हम शांति के माहौल में जी रहे हैं। कुछ देश भले ही अपने स्वार्थों की खातिर लड़ाईयां लड़े हों, परन्तु उन्हें भी बाद में इस बात का एहसास हुआ कि इस लड़ाई में किसी भी धर्म, समुदाय, जाति या देश के लोगों की जान जाए, परन्तु वे होते मानव ही हैं। दुनिया के तमाम देशों में आपस में वैमनस्य इतना बढ़ गया है कि वे एक-दूसरे को नीचा दिखाने पर तुले हुए हैं। अंतर्राष्ट्रीय दबाव, संयुक्त राष्ट्र संघ और बुद्धिजीवियों के दबाव की वजह से शांति बनी हुई है। क्या यह शांति सच्ची शांति है? सच्ची शांति तभी होगी जब हम एक-दूसरे से दिल से मिलेंगे। दिल में कुछ और, चेहरे पर कुछ और का भाव लेकर की जाने वाली अंतर्राष्ट्रीय संधियों से बहुत दिनों तक शांति नहीं बनी रह सकती। 
आज भले ही युद्ध नहीं हो रहा है परन्तु मानसिक रूप से तमाम देश एक-दूसरे से लड़ रहे हैं। चाहे वे एशिया के देश हों, पूर्वी यूरोप के देश हां, अफ्रीका के देश हां, उत्तरी अमेरिका के देश हां या दक्षिण अमेरिका के देश हों। हर जगह कहीं न कहीं दिलों में आग लगी हुई है। दिलों की आग को शांत करने के लिए मानवतावादी दृष्टिकोण विकसित किया जाना जरूरी है। मनुष्य अपनी नैसर्गिंकता को छोड़ रहा है और पलायनवादी बनता जा रहा है। यह पलायनवादी प्रवृत्ति मानव को मानवीय गुणों से दूर ले जा रही है। 
मानव, कुंठाग्रस्त, हिंसाग्रस्त, विवेकहीन क्यों होता जा रहा है ? महामानव बनने के चक्कर में मानव भी नहीं रह पा रहा है। मनुष्य के अंदर अहंकार, घृणा की भावना लगातार बढ़ रही है। ईर्ष्या, द्वेष से ग्रस्त होकर मनुष्य तमाम अनैतिक कार्य करने लगा है। मानव के कुछ गुणों और अवगुणों पर यहां प्रकाश डालना जरूरी है। आज मानव के अंदर आपराधिक प्रवृत्ति, दर्द, मौत की अभिलाषा, निराशा, आंसू, चिड़चिड़ापन और ईर्ष्या-द्वेष क्यों बढ़ता जा रहा है। इस पर हमें गहराई से विचार करना होगा क्योंकि मनुष्य के अंदर आने वाले ये ऐसे अवगुण हैं जो उन्हें मानवता से दूर करते हैं। यह पुस्तक मानवाधिकार व सुशासन पर है। मानवाधिकार से पहले हम मानव, मानवता मानवीय गुणों व अवगुणों पर प्रकाश डालना जरूरी समझते है। 
मानव में बढ़ती आपराधिक प्रवृत्ति
 मानव के अंदर बढ़ती आपराधिक प्रवृत्ति मानवता के साथ-साथ इस पृथ्वी के लिए भी खतरा बनती जा रही है। मानव एक विवेकशील प्राणी है। जब मनुष्य अपना विवेक खोकर अपराध की तरफ कदम बढ़ाता है तो वह सारी मर्यादाओं को भूल जाता है। मान्यताएं समाप्त हो जाती है। रिश्ते तार-तार हो जाते हैं। मानव के अपराध की तरफ बढ़ने का ही परिणाम है कि देश में महिलाओं की प्रति अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं। मनुष्य कुंठा में महिलाओं पर हिंसा करता है, उनका शोषण करता है, इससे मनुष्य के अंदर छिपी पाशविक प्रवृत्ति का आभास होता है। आज एक साल की बच्ची हो या 65 साल की बूढ़ी औरत हर उम्र की लड़कियों या महिलाओं के साथ बदसूलकी की घटनाएं सामने आ रही हैं। स्कूल, कॉलेज, रेलवे, बस, बस स्टैंड, सार्वजनिक स्थल से लेकर धार्मिक स्थलों पर पाशविक प्रवृत्ति देखने को मिल जाती है। इसी तरह से चोरी, सीना-जोरी, छीना-झपटी, चाकूबाजी इत्यादि छोटी-बड़ी घटनाओं से समाज में अपराधियों का खौफ बढ़ता जा रहा है। आज विचार करने की जरूरत है कि मानव अपराध की तरफ अग्रसर क्यों हुआ ? इसके कई कारण हैं। इसमें पहला है - संस्कार की कमी, शिक्षा का अभाव, गलत शिक्षा उसके हक का न मिलना या शोषण जैसी प्रवृत्तियों से त्रस्त होकर व्यक्ति अपराध की तरफ अग्रसर होता है।
 अपराध को बढ़ावा देने वाली प्रवृत्तियां समाज में क्यों पनपीं ? अपराधियों को दंड देने के साथ-साथ अन्य बिंदुओं पर विचार करने की जरूरत है। अपराधियों को सुधरने का मौका दिये बगैर पेशेवर अपराधियों की श्रेणी में खड़ा कर दिया जाता है, जो परिस्थितियां इसके लिए जिम्मेदार थीं उस पर भी पूरी तरह विचार किया जाना चाहिए। कई हिंदी फिल्मों में यह चित्रण किया जा चुका है कि एक ब्रेड या रोटी की चोरी करने वाले बच्चे को पुलिस पकड़कर उसको दंड देती है उसे जेल में डाल देती है तथा बड़ी-बड़ी चोरियां करने वाले लोग आसानी से बच जाते हैं। इन दोनों चोरियों को करने वाले लोगों के बीच क्या अंतर है ? हम सफेदपोश को माफ कर देते हैं, पर छोटे अपराधी पर एक लेबल लगाकर उसे जीवनभर के लिए समाज से अलग-थलग कर देते हैं। इसी भावना से कुंठित होकर वह अपराधी आगे चलकर और भी बड़ा अपराध करता है। 
रोटी चोरी करने वाला बच्चा चोर क्यों बना? इसके लिए जिम्मेदार परिस्थितियों पर समाज विचार क्यों नहीं करता ? हमारे कानून में इसका प्रावधान क्यों नहीं है ? सिर्फ व्यक्ति विशेष ही किसी गलत कार्य के लिए दंड का भागीदार है या उस परिस्थितियों को जन्म देने वाले लोग भी जिम्मेदार हैं। किसी का हक मारने वाले को सजा क्यों नहीं मिलती ? बड़ी-बड़ी चोरियां करने वाले लोग तर्कों-कुतर्कों का सहारा लेकर बच जाते हैं या उनके खिलाफ कोर्ट में केस गया भी तो वे जमानत ले लेते हैं तथा सबूतों को नष्ट करने में लग जाते हैं। अपने प्रभाव, धन का इस्तेमाल कर जमानत ले लेते हैं। बाद में सबूतों को नष्ट करने, गवाहों को डराने व धमकाने से भी बाज नहीं आते। 
आज प्रश्न यह उठता है कि भारतीय संविधान में संशोधन की बातें होती हैं। संशोधन करते वक्त इन छोटे-छोटे पहलुओं पर ध्यान क्यों नहीं दिया जाता? एक माता-पिता जोकि किसी बच्चे का जन्मदाता, पालक-पोषक और रक्षक होता है वह बच्चे का सही पालन-पोषण करने से क्यों चूक गया ? अगर वे माता-पिता गैर जिम्मेदार होने की वजह से अपने बच्चों पर ध्यान नहीं दे पाए तो उन माता-पिता के खिलाफ भी कार्यवाही की जानी चाहिए। यदि वे माता-पिता आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से इतने कमजोर हैं कि बच्चे को सही दिशा नहीं दे पा रहे हैं तो इसके लिए हमारा प्रशासन और सरकार जिम्मेदार है और इसके लिए सरकारी तंत्र से जुड़े लोगों के खिलाफ भी कार्यवाही की जानी चाहिए। इस तरह कानून में बदलाव की जरूरत महसूस की जानी चाहिए।  
दर्द से आहत मानव
दर्द, पीड़ा या छटपटाहट अत्यंत ही बुरी स्थिति है। अगर कोई अन्य जीव द्वारा मानव को दर्द दिया जाता है तो उससे उबरने के लिए उसके पास सैंकड़ों तरीके हैं परन्तु जब एक मनुष्य को दूसरा मनुष्य दर्द देता है तो यह स्थिति असहज हो जाती है, मानवीय संवेदनाओं को झकझोर कर रख देती है। मानव का स्वभाव ही नहीं है किसी को दर्द या पीड़ा देना। हमारे हिन्दू, इस्लामी, ईसाई धर्म ग्रन्थों में इस बात का जिक्र है किसी को मन से, वचन से, कर्म से पीड़ा मत पहुंचाओ। आज के युग में मानव सबसे ज्यादा पीड़ित है, मानव द्वारा दिये गये दर्द से मानव ही पीड़ित है। किसी को पीड़ा देना बहुत बड़ी हिंसा है।
 एक पीड़ा ऐसी होती है जो कि मनुष्य स्वयं अपने लिए निर्मित करता है, एक पीड़ा ऐसी होती है जो दूसरों द्वारा दी जाती है। इसको हम सही अर्थों में आत्मपीड़क और परपीड़क कह सकते हैं। दोनों तरह की पीड़ा पहुंचाने वाले लोग गलत हैं। अपने आपको पीड़ा पहुंचाना या किसी दूसरे को पीड़ा पहुंचाना दोनों ही अत्यंत दुखदायी है। हमारे ग्रंथों में प्रेम बांटना, एक दूसरे के लिए जीना, सहिष्णुता, सहनशीलता, उदारता, सरलता, सरसता जैसी बातों का उल्लेख मिलता है। ईर्ष्या या द्वेष की भावना से ग्रस्त होने के बाद लोग एक-दूसरे के खिलाफ ऐसा करने को बाध्य होते हैं। दर्द और छटपटाहट में आदमी अपना विवेक खो देता है। जब मानव का विवेक ही समाप्त हो जाएगा तो निश्चित रूप से वह अपनी प्रकृति के विपरीत काम करने लगेगा। आज हमारे समाज में यही हो रहा है। स्कूल, कॉलेज के बच्चे, कार्यालय में काम करने वाले लोग, पड़ोसी आपस में जब लड़ते हैं तो एक-दूसरे को पीड़ा पहुंचाने का प्रयास करते हैं। कुछ लोग ऐसी योजनाएं बना लेते हैं कि एक-दूसरे को ऐसी पीड़ा दी जाए जिसे वह जीवन भर न भूल सके। इस तरह की अमानुषिक सोच यदि मानव के मन-मस्तिष्क में जन्म लेती हैं तो निश्चित रूप से इसके लिए भी परिस्थितियां ही जिम्मेदार होती हैं या पालन-पोषण, संगत का भी इसमें बहुत बड़ा हाथ हो सकता है।
 आज विश्व में दर्द निवारक दवाईयों का जितना जाल बिछा है उतना अन्य रोगों की दवाईयों का नहीं। दूसरों को पीड़ा देने वाला इंसान अत्यंत ही निकृष्ट और नीच होता है। ऐसे लोग समाज के दुश्मन तो होते ही हैं वे मानवता के भी दुश्मन होते हैं। कानून में इन लोगों के खिलाफ कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं हो सका है जबकि ये लोग अन्य अपराधियों से ज्यादा खतरनाक होते हैं। आत्मपीड़क लोग तो नशे के आदी हो जाते हैं और परपीड़ा के शिकार होते हैं वे कुंठा के शिकार होने के साथ-साथ गलत प्रवृत्तियों के आदी हो जाते हैं। देश के कानूनविदों, सरकारी रहनुमाओं, स्वयं सेवी संगठनों, बुद्धिजीवियों का यह दायित्व बनता है कि इस तरफ ध्यान देते हुए समस्या के निदान के लिए ठोस पहल करें।
मौत को गले लगाने की चाह
हमारे देश में ही कई जगहों पर न्यायालयों में इच्छामृत्यु के लिए अर्जियां लंबित हैं। क्या आज के 50 साल पहले इसकी कल्पना की जा सकती थी कि कोई व्यक्ति अपनी मृत्यु की अभिलाषा पाले हुए हो। इच्छामृत्यु की याचिकाएं तो ज्यादातर असाध्य रोगों से ग्रस्त और जीवन से निराश हो चुके लोग देते हैं। आज समाज में बहुत सारे ऐसे लोग कुंठित और टूटे हुए मिल जाएंगे जो मृत्यु को गले लगाना चाहते हैं। जब उनसे बातें की जाती हैं तो उनकी बातें निराशावादी होती हैं मानो इस दुनिया से वे कुछ भी पाने की इच्छा छोड़ चुके हैं, दुनिया दुश्मन नजर आने लगी है। ज्यादातर उच्च व मध्यम वर्ग के लोगों में यह प्रवृत्ति देखने को मिलती है। आज समाज में निराशावादी लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। एक गिलास में आधा पानी रखकर लोगों से पूछा जाए कि गिलास की स्थिति क्या है तो आशावादी लोग कहेंगे आधा गिलास भरा हुआ है परन्तु निराशावादी कहेंगे आधा गिलास खाली है। जो लोग समाज में बहुत कुछ पाने की इच्छा रखते हैं, उन्हें जितना मिलता है उतना ही उनके लिए कम पड़ता जाता है। यह प्रवृत्ति लगातार जारी रहती है। एक दिन ऐसा आता है कि मनुष्य को इच्छानुसार मिलना बंद हो जाता है। ऐसे में उसके सपनों के पंख टूट जाते हैं। उसकी इच्छाएं धराशायी हो जाती हैं। हवाई महल चकनाचूर हो जाते हैं। ऊंची उड़ान भरने के सपने जमींदोज हो जाते हैं। ऐसे लोगों को झूठी शान वाला कहा जा सकता है। ऐसी झूठी शान वाले लोग परिस्थितियों से लड़ने में अपने आपको असमर्थ पाने लगते हैं। पूर्व में हॉकी गई लंबी-लंबी डींगों की वजह से लोग उनका मजाक उड़ाने लगते हैं। ऐसे में व्यक्ति हर जगह उपेक्षित होने लगता है। वह हर जगह उपेक्षा के भाव से देखा जाने लगता है। कोई भी मनुष्य कितना ही बड़ा क्यों न हों, कितना ही बुद्धिमान क्यों न हो, वह एक साथ कई जगह नहीं लड़ सकता। वह दस जगह पर हाथ मारता है पर उसे निराशा ही हाथ लगती है। ऐसे में उसका वह दर्प चूर-चूर हो जाता है, वह कुंठित होने लगता है। उसकी व्यथा इतनी बढ़ जाती है उसे रात और दिन का अंतर भी मालूम नहीं पड़ता। कुछ लोग मुंह में धूल पोतकर सब सामान्य होने का झूठा एहसास दिलाते हैं, पर अंदर से टूटे हुए होते हैं। ऐसे लोगों में जो खुद्दार होते हैं वे मौत को गले लगाने की बात करते हैं तथा जो कमजोर दिल के होते हैं वे दिन-रात सोच-सोचकर ही व्यथित होते रहते हैं। ऐसे में उनका जीवन अत्यंत ही दुरूह हो जाता है। रात में उन्हें नींद नहीं आती और वह विभिन्न व्यसनों के शिकार हो जाते हैं। यह परिस्थितियां मानव के लिए अत्यंत ही घातक हैं। इससे मानव ही प्रभावित होता है। मानव ने स्वयं अपने लिए ऐसी परिस्थितियां निर्मित कर ली हैं जो उसके लिए ही घातक बन गई हैं। 
इसी तरह मौत की अभिलाषा रखने वाले कुछ अन्य तरह के लोग भी होते हैं। विभिन्न लाइलाज बिमारियों से ग्रसित लोग भी मौत को गले लगाना चाहते हैं। दुर्घटनाओं में घायल होने के बाद जिनके अंग भंग हो जाते हैं, जो अपंग हो जाते हैं, वे भी जीवन से निराश हो जाते हैं। इसी तरह से कुछ महिलाएं शोषण का शिकार हो जाती हैं और वे अपने आपको इतना अपमानित और छला हुआ महसूस करती हैं जिससे उनका जीवन से मोह ही भंग हो जाता है। इसी तरह से कुछ अपराधी लोग उम्र के अंतिम पड़ाव पर पहुंचते हैं जब उन्हें अपने कुकृत्यों का एहसास होता है वे भी जीवन का मोह छोड़कर मौत को गले लगाना चाहते हैं। गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी भी मानव के लिए ऐसी परिस्थितियां पैदा कर देती हैं कि कुछ लोग मृत्यु को गले लगाना ही उचित समझते हैं।
 देश के कई भागों में किसानों द्वारा की जाने वाली आत्महत्याओं पर यदि विचार किया जाए तो यह पता चलता है कि ज्यादातर किसान साहुकारों से कर्ज लेकर खेती करते हैं परन्तु प्राकृतिक आपदाओं की वजह से भरपूर फसल न होने की वजह से उनकी आशा निराशा में बदल जाती है। ऐसे में उन किसानों के सपने टूट जाते हैं। किसी किसान को अपनी बेटी का विवाह करना होता है, किसी को बच्चे को पढ़ाना होता है, साथ ही उसे साल भर खाने के लिए भी अनाज की जरूरत होती है। इन सबके साथ-साथ उसे अपना कर्ज भी चुकता करना होता है। जब उसकी फसल नष्ट हो जाती है तब वह किसान मौत को गले लगाना ही बेहतर समझता है। इसके अलावा कुछ विद्यार्थी परीक्षा परिणामों में पर्याप्त अंक न मिलने की वजह से लोक-लाज के डर से मौत को गले लगाना अच्छा मान लेते हैं। इसी तरह से आज के कुछ युवक-युवतियाँ आकर्षण की भावना को प्यार मान लेते हैं। प्यार और आकर्षण में फर्क होता है। इसे बहुत ही कम युवक-युवतियां समझ पाते हैं। प्यार का बहुत ही विस्तृत और गहन अर्थ होता है। लोग उसी के चक्कर में पड़कर एक-दूसरे के साथ जीने-मरने की कसमें खाने लगते हैं। कुछ सामाजिक बंधनों, परिस्थितियों की वजह से जब दोनों को अलग होना पड़ता है तो वे लोग भी मौत को गले लगाना पसंद करते हैं। इसी तरह से कुछ युवक अपने जीवन में वांछित सफलता न मिलने की वजह से निराश हो जाते हैं। वह संघर्ष करने की बजाए हथियार डाल देते हैं और मौत को गले लगाना ही बेहतर समझते हैं। 
मौत को गले लगाने की अभिलाषा किसी भी रूप में हो, अत्यंत ही निंदनीय और घृणित है। यह जीवन ईश्वर का दिया हुआ है। इस दुनिया में व्यक्ति को खुद संघर्ष करना पड़ता है। संघर्ष से मुंह मोड़ना गलत है।  किसी  भी तरीके से मौत को गले लगाना उचित नहीं कहा जा सकता है। न तो यह कानूनी तौर पर सही है, न ही मानवता के लिए उचित है। जीवन को इस तरह नष्ट कर देना प्रकृति के साथ अन्याय है, अपने परिजन और समाज के साथ अन्याय है। हमारे समाज में इस तरह की बढ़ती प्रवृत्तियों पर आज समाज को सोचने की जरूरत है। कानून में तो इसका कठोर प्रावधान किया गया है। आत्महत्या का प्रयास करने वालों के खिलाफ कड़े से कड़ा कानून बनाया गया है परन्तु उन कानूनों का सही परिप्रेक्ष्य में पालन नहीं हो पा रहा है। समाज में मानव जीवन में आने वाली कठिनाईयों से लड़ने के लिए लोगों में माद्दा विकसित करने का पर्याप्त प्रयास नहीं किया गया। आने वाले समय में इस दुनिया में और भी विसंगतियां उत्पन्न हो सकती हैं। मनुष्य को ऐसी विसंगतियों से लड़ने के लिए अपने आपको तैयार करना होगा। इसके लिए समाज के बुद्धिजीवियों, सरकारी प्रतिनिधियों, स्वयंसेवी संगठनों को मिलकर काम करने की जरूरत है।
मानव में बढ़ती निराशा व कुंठा  
मनुष्य किसी चीज को पा लेने की इच्छा पालता है परन्तु किसी कारणवश वह उसे मिल नहीं पाती। तो उसकी आशा निराशा में बदल जाती है। आशा जब निराशा में बदलती है तो व्यक्ति के अंदर एक विशेष तरह की प्रतिवर्ती क्रिया होती है।  इस क्रिया से व्यक्ति सामान्य अवस्था से हट जाता है। आगे चलकर यही निराशा वीभत्स रूप ले लेती है। इस संसार में सबको सब कुछ नहीं मिलता। यह एक कड़वा सच है। इस सच को मानकर यदि हम इस जीवन में आगे बढ़ें तो निराशा जैसी चीजों से बचा जा सकता है। निराशा व्यक्ति के जीवन में एक ठहराव ला देती है। कुछ लोग इस निराशा से उबरने के लिए नए ढंग से प्रयास करने लगते हैं। इसके बावजूद भी जब उन्हें निराशा हाथ लगती है तो वे हतप्रभ रह जाते हैं। आज अस्पतालों में भी बहुत से अवसाद ग्रस्त रोगी अपना इलाज कराते देखे जा सकते हैं। निराशा को अपने ज़हन में नहीं उतारना चाहिए। आज समाज में इसका उल्टा हो रहा है। निराश व्यक्ति जब बार-बार निराश होता है तो वह हताश हो जाता है। हताशा में वह मानवीय संवेदनाओं से दूर हो जाता है और मानवीय गुणों से वंचित होना शुरू कर देता है फिर उस व्यक्ति के अंदर बदले की भावना उपजती है, वह समाज से बदला लेने के लिए उतारू हो जाता है। 
समाज में रहने वाले उसके पड़ोसी, संबंधी, मित्र, या और लोग यदि उससे आगे निकल जाते हैं और वह मनुष्य जो चाहता है वह उसे मिल नहीं पाता तो वह निराश होता है। व्यक्ति के मन में कुंठा के साथ-साथ जलन की भावना उत्पन्न होने लगती है। निराशा से उबरने का एक ही उपाय है कि मानव एक सच्चा मानव बनकर ही जीने का प्रयास करे। जितना उसे मिल रहा है उसी में रहने का प्रयास करे। चादर से लम्बा पैर फैलाने पर व्यक्ति का ही नुकसान होता है। यदि मानव के अंदर संतोष व संयम आना शुरू हो जाए तो वह तमाम बुराइयों पर विजय प्राप्त कर सकता है। जब व्यक्ति को लगे कि वह निराश है, कुंठा में जी रहा है, हताशा से व्यग्र हो चुका है तो उसे आत्मचिंतन करने की जरूरत होती है। आत्मचिंतन से व्यक्ति को सही राह मिल सकती है।
 
च  च   च
मावाधिकार अत्यंत ही विस्तृत विषय है। इस पर जितनी खोज हुई है, काफी कम साबित हुई है। मानव एक विवेकशील प्राणी है, मानव भावनाओं से भरा प्राणी है। कई मानवीय कार्य भावनाओं के वशीभूत होकर किए जाते हैं। भावनाएं अच्छी भी होती हैं, और बुरी भी होती हैं। मनुष्य अपने विवेक के अनुसार कार्य करता है। कभी-कभी व्यक्ति स्वार्थवश कुछ ऐसे कार्य कर जाता है जो गलत माने जाते हैं। वह गलत भावनाओं में बहकर गलत फैसला ले लेता है। मानवीय संवेदनाएं व्यक्ति के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। मनुष्य से जुड़ी लगभग सभी चीजें मानवाधिकारों के दायरे में आती हैं। जब मानव हितों को चोट पहुंचती है या अधिकारों से उसे वंचित किया जाता है तो यह मानवाधिकारों का उल्लंघन माना जाता है। यह कई रूपों में देखने को मिलता है। प्रेम, दर्द, हंसी, अपराध, आंसू, मौत, जिन्दगी, बाल्यावस्था, युवास्था, बुढ़ापा, आशा-निराशा, न्याय-अन्याय, कर्त्तव्य, आह जैसी चीजें भी मानव की अवस्था व भावनाओं से जुड़ी हैं। एक मानव के अंदर उपरोक्त तमाम चीजें रची बसी हैं। 
एक बच्चा जब जन्म लेता है तो उस समय वह सिर्फ एक मानव होता है। वह जब रोता है तो उसकी क्या भाषा होती है उसका अनुमान माता-पिता या परिजन अपनी भाषा के अनुसार लगाते हैं क्योंकि किसी भी वर्ण, समुदाय, जाति में जब कोई बच्चा पैदा होता है तो सबकी हरकतें एक जैसी ही होती हैं। सभी बच्चे नाल से मां से जुड़े रहते हैं। मां के पेट में उल्टे लटके रहते हैं। बाहर निकलने के बाद नाल काटकर उन्हें अलग किया जाता है। बाहर आने के बाद बच्चा रोता है, हंसता है, खेलता है, हाथ-पैर मारता है। मां की गोद से चिपक जाता है, दूध पीता है, सोता है, फिर जागता है। ये सभी समुदाय-सभी वर्ग के बच्चों में देखने को मिलता है। हम पृथ्वी पर आने के बाद अपने आप को बांट लेते हैं। कोई हिन्दू हो जाता है, तो कोई मुसलमान, कोई पारसी, कोई यहूदी। इसी तरह से धर्म के बाद लोग जातियों में बंट जाते हैं। कोई ऊंची जाति, कोई नीची जाति, कोई गोरा, तो कोई काला कहलाने लगता है। यहीं से मानवाधिकारों के प्रति उल्लंघन की शुरूआत होती है। 
मानव इस पृथ्वी पर जीने के लिए, कुछ पाने के लिए निरंतर संघर्ष करता है। इस संघर्ष की दुनिया में वह छोटी और बड़ी लड़ाइयां लड़ता है। इन लड़ाइयों को लड़ने में लोग लगातार बंटते जाते हैं। कभी हम एक घर के आदमी होते हैं, फिर हम एक गली के माने जाने लगते हैं, उसके बाद किसी ग्राम या मोहल्ले के हो जाते हैं। इसके पश्चात हम ब्लॉक, तहसील, जिला, प्रांत व देश के स्तर पर बंट जाते हैं। यह प्रक्रिया निरंतर जारी है। मानव इसी में लगा हुआ है। मानव कभी सीमाओं को लेकर लड़ता है, कभी अपने रंग की खातिर लड़ता है, कभी अपनी जाति की खातिर लड़ता है, कभी अपने संप्रदाय की खातिर लड़ता है, कभी अपने परिवार की खातिर लड़ता है। अंत में परिवार में आकर वह अपने लिए अपनों से ही लड़ने लगता है। यही इस दुनिया में जीवन की रीति मान ली गई है। आज हम देश, समुदाय, प्रांत, जिला, जाति में बंट कर रहते हैं। अगर देशों की सीमाएं न होती, जातियों का बंधन न होता, सम्प्रदायों का घेरा न होता, गोरे-काले का भेद न होता, मानव सिर्फ मानव होता तो आज इस दुनिया का रंग कैसा होता है ? क्या कभी हमने सोचा है कि जो पक्षी साइबेरिया से उड़कर भारत में चले आते हैं, भारत के जो पक्षी पाकिस्तान में पहुंच जाते हैं, भारत की नदियां पाकिस्तान, बांग्लादेश पहुंच जाती हैं, हिंद महासागर, प्रशांत महासागर, ये देश की सीमाओं को नहीं मानते। इसी तरह चांद, सूरज और तारे भी जाति-पाति, द्वेष, भेदभाव और सीमाओं को नहीं मानते। सूरज कहां उगता है, कहां अस्त होता है, हवा कहां तेज चलती है, कहां धीमी हो जाती है उसे इस बात का एहसास नहीं होता। तो मानव ही क्यों सीमाओं के दायरे में रहता है ? मनुष्य को अमेरिका, जापान, रूस, पाकिस्तान, आस्ट्रेलिया, फ्रांस, इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका या अन्य देशों में जाने के लिए पासपोर्ट व वीजा की आवश्यकता पड़ती है। मानव अपने आप को इस पृथ्वी का सबसे समझदार व विवेकशील प्राणी मानता है। इतना विवेकशील होने के बावजूद भी मानव खंडों में बंटता क्यों जा रहा है ? आज मानव ने पारमाणविक और जैविक हथियारों का इतना बड़ा जख़ीरा खड़ा कर लिया है कि करीब डेढ़ दर्जन बार इस पृथ्वी को नष्ट किया जा सकता है। क्या यह मानव की उपलब्धि है? क्या यही विज्ञान की उपलब्धि है ? यदि विज्ञान हमें एक-दूसरे को मारने की सीख देता है, घृणा फैलाता है, तो हम इस विज्ञान को अपना मित्र माने या शत्रु ? इस पर मानव को गहनतापूर्वक विचार करने की जरूरत है।
एक व्यक्ति अपराधी क्यों बन जाता है ? उसे जिन्दगी की अपेक्षा मौत की चाह क्यों हो जाती है ? वह निराशावाद के गहन दलदल में चला जाता है। खुशियों की फुलवारी से हटकर वह आहों और तन्हाईयों में खो जाता है। जिन्दगी आंसुओं से भर जाती है, जोकि उसके लिए बोझ बन जाती है। यह सब परिस्थितियां मानव के जीवन में क्यों उत्पन्न होती हैं ? इस पर भी गहन रूप से विचार एवं मंत्रणा करने की जरूरत है। यह विषय आत्मचिंतन और आत्ममंथन दोनों का है। आज हमारे समाज का दृष्टिकोण एकांगी होता जा रहा है। महानगरों से लेकर छोटे नगरों में भी अब ओल्डऐज होम खुलने लगे हैं। 
ओल्डऐज होम की बढ़ती संख्या को देखकर भारत की बढ़ती आबादी या भारत में बढ़ती बुजुर्गों की संख्या का अनुमान नहीं लगाया जा सकता बल्कि इनसे मानव की बदलती स्वार्थी प्रवृत्ति का पता लगता है। मनुष्य के अंदर एकांगी दृष्टिकोण का आना, स्वार्थपरता, बुजुर्गों के प्रति सम्मान की भावना कम होना जैसी प्रवृत्तियां घर करती जा रही हैं। ऐसा तो जानवर भी नहीं करते। जानवर भी एक साथ रहते हैं। जंगलों में रहने वाले पशु या जानवर झुंड में शिकार के लिए या अपने भोजन के लिए निकलते हैं और अपनी क्षुधा शांत करने के बाद साथ-साथ रहने लगते हैं। भले ही जानवर एक-दूसरे से लड़ते हैं परन्तु रहते साथ ही हैं। मानव तो एक-दूसरे से तन से भी लड़ता है और मन से हमेशा लड़ता रहता है। किसी व्यक्ति की यदि किसी व्यक्ति से लड़ाई हो गई या दुश्मनी हो गई तो दोनों एक-दूसरे को नीचा दिखाने का प्रयास करते हैं। सामने और पीठ पीछे दोनों तरह से लोग एक-दूसरे के खिलाफ क्रियाशील रहते हैं। विडंबना तो यह है कि तन से तो वे एक-दूसरे के विरोध में लगे ही रहते हैं, उनका मन भी इसी में लगा रहता है। लड़ने के बाद वे कोर्ट-कचहरी या पंचायतों के चक्कर में पड़ते हैं इससे उनका धन भी नष्ट होता है। ऐसे में ये कहा जा सकता है कि तन-मन-धन तीनों से एक-दूसरे के पीछे पड़ जाते हैं। वहीं बेजुबान पशु-पक्षी या जानवर ऐसा नहीं करते। वे लड़ते जरूर हैं पर बाद में शांत होकर एक साथ रहने लगते हैं और मन में कोई बात नहीं रखते। यही वजह है कि कोई व्यक्ति जब जानवरों को मारना चाहता है तो वे मिलकर आक्रमण कर देते हैं। मनुष्य हर जगह लड़ने को विवश क्यों हैं ? वह शांत क्यों नहीं रह सकता ? मानव-मानव में सच्चा प्रेम क्यों नहीं है? अगर ये सब चीजें ठीक हो जाएं तो दुनिया ही बदल जाएगी। क्या ऐसा नहीं है कि मानव अपने मूल मुद्दे से भटक गया है? मानव ने अंटार्टिका महाद्वीप में रहना शुरू कर दिया है। मानव ने चांद और मंगल ग्रह पर भी अपना पैर रख दिया है। मानव ने पृथ्वी पर मौजूद तमाम संसाधनों का सदुपयोग करते-करते दुरुपयोग करना शुरू कर दिया है। 
प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करते-करते मानव प्रकृति को नष्ट करने में लग गया है। पहले मानव पृथ्वी से अन्न व फल पैदा करके जीवनयापन करता था। आज अपनी विलासिता के लिए मनुष्य ने पृथ्वी को ही खोखला कर दिया है। अपनी अहमियत को जताने के लिए मनुष्य ने पृथ्वी के नीचे परमाणु परीक्षणों का ढेर लगा दिया है। ऐसा करके मानव ने अपने लिए विनाश का रास्ता तैयार कर लिया है। पृथ्वी प्रदूषित हो चुकी है।
 पृथ्वी से पेड़ों का कटना निरंतर जारी है। जंगल खत्म होते जा रहे हैं। इसी का परिणाम है कि विभिन्न शहरों में तेंदुआ, चीता, शेर जैसे जानवर घरों में घुसने लगे हैं। दातों के लिए हाथियों को मार दिया जाता है तथा खालों के लिए भी जानवरों को मारा जा रहा है। वन्य जीवों की अंधाधुंध हत्या भी प्रकृति के साथ घोर अन्याय है। पहले गांव में कौआ, तीतर, बटेर, कोयला, गौरेया, मोर जैसे पक्षियों की भरमार हुआ करती थी। आज इन पक्षियों में तमाम की प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं। कोयल देखने को नहीं मिलती। शहरों में कबूतरों की संख्या बढ़ रही है। गांव में पेड़-पौधे काफी कम रह गए हैं। गौरेया जैसी छोटी सी पक्षी ने भी पलायन करना शुरू कर दिया है। इसी तरह से जंगलों में से तमाम वन्य प्राणी भी विलुप्त हो चुके हैं। हिरन, बारहसिंगा, शेर, चीता के साथ-साथ, दरियाई घोड़ा जैसी प्रजातियाँ विलुप्त होने की कगार पर आ गई हैं। नदियां-तालाब सूख गए हैं। ऐसे में मछलियों की प्रजातियां भी विलुप्त हो रही हैं। और तो और गंगा, यमुना, सरयू, ब्रह्मपुत्र, क्षिप्रा, गोदावरी, कृष्णा जैसी पवित्र नदियों का जल भी अशुद्ध हो चुका है। काशी व प्रयाग हिन्दुओं के लिए सबसे पुण्य नगरी मानी जाती है। इन नगरों में गंगा का पानी विषैला हो चुका है। किनारे से लेकर करीब 5 से 10 मीटर के बीच पानी अत्यंत ही विषैला हो चुका है। इसी तरह से मथुरा में यमुना नदी का पानी कोकाकोला के रंग का हो गया। मानव द्वारा पैदा किए प्रदूषण से जन्तुओं का भी नाश हो रहा है। मछलियां नष्ट हो रही हैं। 
इसी तरह से हम आधुनिक और वैज्ञानिक खेती के नाम पर उर्वरकों का अंधाधुंध प्रयोग करते जा रहे हैं। इससे उर्वरा शक्ति कम होती जा रही है। आज के 50-60 साल पहले, ऊसर और बंजर भूमि को उर्वरा बनाने के लिए कारगर प्रयास किए गए। आज हमारी उपजाऊ भूमि भी उर्वराशक्ति खोती जा रही है। अधिक मात्रा में उर्वरकों के प्रयोग से मिट्टी के अंदर के कई महत्वपूर्ण तत्व समाप्त हो रहे हैं। पृथ्वी के अंदर केंचुआ जैसे जीव हुआ करते थे जो पृथ्वी की उर्वरा शक्ति को बढ़ाते थे वे भी नष्ट होने लगे हैं। सिंचाई के संसाधनों को बढ़ाने के लिए नहरों का जाल बिछ गया है तथा मोटर पम्पों से जमीन के नीचे का जल भारी मात्रा में निकाला जा रहा है। इससे पृथ्वी के अंदर का जलस्तर काफी नीचे चला गया है। इससे आगे आने वाले दिनों में देश के कई भागों में पैदावार में कमी आएगी फलस्वरूप आगे चलकर भारी खाद्यान्न संकट उत्पन्न हो सकता है। यह खाद्यान्न संकट महामारी का रूप ले सकता है। खाद्यान्न की कमी होने से आगे चलकर लोग किसी अन्य तरीकों से अपना भोजन का प्रबंध करने लगेंगे। ऐसे में मछलियों और अन्य समुद्री जीवों पर भी भारी संकट आ सकता है। उपरोक्त तमाम परिस्थितियों को यदि ध्यान में रखकर देखा जाए तो हम यह कहने को बाध्य हो जाते हैं कि मानव के लिए आज जो संकट खड़ा हुआ है वह मानव द्वारा ही निर्मित है। मानवाधिकारों के लिए आज मानव इसलिए जूझ रहा है क्योंकि एक मानव, दूसरे मानव के प्रति संवेदनशील नहीं रह गया। समाज में संवेदनशीलता खत्म होती जा रही है। लोग अपने ही दर्द और तड़प को दर्द और तड़प समझ रहे हैं। दूसरे के दर्द और तड़प को लोग देखना नहीं चाहते। ज्यादातर लोग समाज में दिखाने के लिए, इज़्ज़त पाने के लिए कुछ सामाजिक कार्य कर रहे हैं। मनुष्य के अंदर ढोंग की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। मनुष्य दोहरी जिन्दगी जीने लगा है। समाज के लिए और अपने लिए कुछ और। कहने के लिए मनुष्य समाज सेवा में लगा होता है पर उस समाज सेवा की आड़ में वह क्या-क्या करता है, यदि इस पर वह स्वयं विचार करें तो वह सच्चाई से परिचित हो पाएगा। वह इतना व्यस्त है कि उसके पास सोचने का वक्त ही नहीं है। आज तमाम जगहों पर मानवाधिकार की बात हो रही हैं, गोष्ठियां हो रही हैं। इन गोष्ठियों में होने वाली चर्चाओं में भाग लेने वाले ज्यादातर लोग किस नजरिए के होते हैं इस पर भी विचार किया जाना चाहिए। हमें कुछ ऐसे लोग दिख जाते हैं जो सही मायने में मानवतावादी न होने के बावजूद वे मानवाधिकार की बात करते हैं।  
मानव का जिस समाज में जन्म होता है उसी समाज के अनुरूप उसके अधिकार भी हो जाते हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ की सार्वभौम घोषणा में कहा भी गया है सभी मानव समान अस्तित्व और समान अधिकार के साथ स्वतंत्र रूप से जन्म लेते हैं, वे बुद्धि और अन्तःकरण से युक्त होते हैं। उन्हें भाईचारे की भावना के विकास की दिशा में प्रयत्न करने चाहिए। इस घोषणा पर विचार करने के बाद मन में कई बातें उठती हैं। मनुष्य मानवाधिकारों के लिए तभी काम करेगा जब वह सही मायने में मानव धर्म को मानने वाला हो। आज समाज में सबसे पहले लोगों को मानव बनने की जरूरत है। मानवाधिकारों के प्रति जागरूकता पैदा करने से पहले हमें लोगों को यह बताने की जरूरत है कि मानव का धर्म क्या है ? उसका कर्त्तव्य क्या है ? मानव का सच्चा कर्म क्या है ? जिसके बल पर वह मानव कहला सके। इसके लिए हमें प्राथमिक स्तर पर लोगों के अंदर चेतना जाग्रत करने की जरूरत है। जब मानव अपने स्वभाव को ही भूल जाएगा तो वह सच्चा मानव कैसे कहलाएगा ? जब तक कोई सच्चा मानव नहीं बन पाएगा तब तक वह मानवाधिकारों की बातें कैसे समझेगा ? समाज के मनीषियों, बुद्धिजीवियों, मानवाधिकार के रहनुमाओं, सरकार के प्रतिनिधियों, सयुंक्त राष्ट्र संघ के प्रतिनिधियों से मेरा आग्रह है कि वे इस बारे में गंभीरतापूर्वक विचार करें। 
आज मानवाधिकार आयोग से जुड़े लोगों को सबसे पहले समाज में मानवता की शिक्षा दी जानी चाहिए। मानवीय गुणों, मानवीय धर्मों, मानवीय परंपराओं, मानवीय पहलुओं पर लोगों को प्रशिक्षित किया जाना जरूरी है। इसके लिए समाज में चेतना जाग्रत करने की जरूरत है। इसके बाद ही मानवाधिकारों पर शिक्षा देने का फल मिल सकता है। 
आज हम देखते हैं कि नौंवी और दसवीं में पढ़ने वाला छात्र अश्लील हरकतें करता है, लड़कियों से छेड़छाड़ करता है, पॉकेटमारी, चाकूबाजी, पिस्तौल और बम चलाता है। यह चूक क्यों हुई, किससे हुई, कौन है जिम्मेदार ? इसके लिए उसका परिवार जिम्मेदार है, उसके माता-पिता जिम्मेदार हैं, उसके शिक्षक जिम्मेदार हैं या पूरा समाज जिम्मेदार है, या हमारी व्यवस्था जिम्मेदार है ? जब तक हम इसकी जिम्मेदारी महसूस नहीं करेंगे, तब तक इस समस्या का निदान नहीं ढूंढ सकते। किसी का बेटा आवारा हो गया है, या लड़की आवारा हो गई है। तो इसका दोष दूसरों पर मढ़ दिया जाता है। समाज, माता-पिता पर दोष मढ़ता है, माता-पिता उसके संगे-साथियों, रिश्तेदारों पर दोष मढ़ते हैं। इसकी जिम्मेदारी कोई नहीं लेता, कोई अपने आपको दोषी नहीं मानता। इसीलिए ऐसी घटनाएं बढ़ रही है। समस्या की जड़ क्या है ?
जन्म लेने के बाद हर इंसान सिर्फ इंसान होता है। यहां आकर समाज के अनुसार कोई हिन्दू बन जाता है, कोई मुस्लिम, कोई सिख, कोई ईसाई। यह भी कोई बुरी बात नहीं है। हम जिस समाज या जिस धर्म में रहते, पलते, बढ़ते और जीते हैं। हमें उस समाज के साथ-साथ प्रत्येक धर्म, प्रत्येक समुदाय, प्रत्येक क्षेत्र, प्रत्येक देश का सम्मान करना चाहिए। जहां हिंदू धर्म में मानव धर्म को श्रेष्ठ बताया गया है। विश्व बन्धुत्व की भावना ही हिन्दुत्व में रची-बसी है। इसी तरह से इस्लाम धर्म भी मानवता और विश्व बन्धुत्व से पूरी तरह से ओत-प्रोत है। इस्लाम कहता है कि मां-बाप के साथ अच्छा व्यवहार करो, नातेदारों के साथ अच्छा व्यवहार करो, यतीमों और मोहताजों के प्रति भी व्यवहार अच्छा होना चाहिए। इसके साथ ही पड़ोसियों,  आश्रितों के साथ अच्छा व्यवहार करने की शिक्षा दी जाती है। इस्लाम मनुष्य को शांति और सहिष्णुता का मार्ग दिखाता है। ये सत्य, अहिंसा, कुशलता का समर्थक है। इसके लक्ष्य शांति, सुधार और निर्माण है। इस्लाम धर्म कमजोरों के अधिकारों का रक्षक है। इसी तरह ईसाई धर्म में भी मानव और मानवता की महत्ता का वर्णन मिलता है। ईसाई धर्म में भी विश्व बन्धुत्व और मानव का मानव के प्रति प्रेम, सहिष्णुता, उदारता, सरलता जैसे गुण विद्यमान हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि दुनिया का कोई भी धर्म गलत राह पर चलने की शिक्षा नहीं देता।
सभी धर्म जोड़ने की बातें करते हैं। फिर भी कितनी बड़ी विडंबना है कि इस पृथ्वी पर लोग धर्म के नाम पर बंटे हुए हैं। सोचने वाली बात यह है कि हम भले ही विभिन्न धर्मों से, विभिन्न देशों से जुड़े हुए हैं, परन्तु हम सब एक हैं। हम सब उसी परमात्मा, अल्लाह, गॉड की देन हैं जिसने सबको बनाया है। ऐसे में हम आपस में क्यों लड़ते हैं, ये आज तक समझा नहीं जा सका है। हम जब सच्चे मानव बन जाएंगे तो मानवाधिकार की बातें आसानी से समझ में आ जायेंगी, क्योंकि मानव बनते ही हम मानवीय गुणों और मानवीय धर्मों, मानवीय पंरपराओं का पालन शुरू कर देंगे।
आज मानव ऊपर से कुछ और अंदर से कुछ और क्यों है ? इस पर हमारे वैज्ञानिकों और धर्म गुरुओं और समाज सुधारकों को विचार करना चाहिए। 
- डॉ. एम. यू. दुआ